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यकायक ये खौफनाक मंजर- हिमाचल की तबाही संकेत इंसानी या आसमानी -समय से पहले जागना होगा –

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– समाज जागरण 24tv –

    कृष्ण राज अरुण
8 जुलाई से 11 जुलाई तक केवल इन दिनों में अबतक जो आसमान से आई वर्षा के बहाने नदियां जल थल कर गयी हरियाणा पंजाब को भी पहाड़ी सैलाब तहस नहस करने को उत्तावला है अब राजधानी दिल्ली को भी हिला चुकने के संकेत हैं। गजब का संकेत देता जा रहा है बारिस के बहाने इंसानी जीवन को। अब से पहले कुछ ही साल पहले उत्तराखंड केदारनाथ और अब जुलाई 2023 में हिमाचल में खौफ का मंजर जिस कदर आया है निश्चय ही सम्भलने का संकेत है।
यह खौफ का वातावरण काफी समय से तैयार हो रहा था जो अब फूटा है नदियों का क्रोध बनकर जिसे हम पहाड़ों में भुस्सखलन के बहाने या फिर बादल फ़टने तक नदियों का सैलाब इंसान की पैदा की गयी मुसीबत को आज दकलह रहे हैं। ये सभी तस्वीरें बताती हैंकि अंधे स्वार्थ ने हरे भरे जनजीवन को हमने तहस नहस कर डाला ?
हिमाचल देवभूमि की धरा कूदरत्ती नूर हर साल लाखों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करती आई है. लेकिन इस वक्त हिमाचल में हर तरफ तबाही का मंजर है. हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और भूस्खलन की अलग-अलग घटनाओं में 20 से ज्यादा लोग जानें गंवा चुके हैं. बाढ़ से होने वाले नुकसान का अभी अंदाजा लगा पाना मुश्किल है. लेकिन यह चिंता का विषय है कि आखिर हिमाचल में ये तबाही आई क्यों ?
वास्तव में वैज्ञानिकों के संकेत को समझें तो यह हिमाचल प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर विनाश के लिए जलवायु परिवर्तन और मानवजनित गतिविधियां जिम्मेदार हैं।
जिस तरह से पहाड़ी राज्यों में तापमान बढ़ा हैं और मौसमी मिजाज बदलने के चलते राज्य में तापमान और वर्षा का पैटर्न बदलता जा रहा है और इससे नदी और अचानक बाढ़, सूखा, हिमस्खलन, बादल फटना, भूस्खलन और जंगल की आग जैसी चरम जलवायु घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है। हिमाचल के चंबा इलाके में बादल फटने से भारी तबाही मची-
इस हादसे में कई मकान और सड़कों का नामोनिशान तक मिट गया. बादल फटने के बाद चंबा में भयानक मंजर को देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. हर तरफ तबाही की निशानियां बिखरी मिलीं. इससे पहसे जैसे ही बादल फटा पहाड़ों से पानी तेज बहाव के साथ नीचे गिरने लगा और सामने आने वाली सभी चीजों को तबाह करता हुआ आगे बढ़ने लगा. पानी के इस वेग को ना सड़कें रोक पाई। मनाली में व्यास नदी का रौद्र रूप जैसा तांडव दिखा रहा था कि रूह कांप जाये। किन्नौर में देखते देखते ही पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा जमीन पर आ गिरा, जिसके बाद वहां चारों तरफ धुआं छा गया. इससे पहले वहां से गुजरने वालों को पहाड़ के दरकने की आहट मिल गई थी।
लम्बे समय से ही उत्तराखंड हिमाचल ऐसी घटनाओं के बढ़ने के इशारे दे रहा है जैसा कि पहाड़ी प्रदेशों में भूस्खलन कहर बरपा रहा है. उत्तराखंड
के धारचूला और हिमाचल के किन्नौर से जमीन खिसकने से भारी तबाही हुई है. कई लोगों के घर बर्बाद हो गए।
समझा ही नहीं हमारी सत्ताओं ने वैज्ञानिकों की चेतावनी भाषा को -?
१. हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियां बहुत नई हैं क्षेत्र शिवालिक की जड़ें कठोर नहीं है अर्थात अभी तक कठोर नहीं हुए हैं. ऐसे नाजुक वातावरण में, अनुचित मानवीय गतिविधियां जैसे अनियोजित विकास, वनों की कटाई, सड़क काटना, सीढ़ी बनाना और अधिक तीव्र मौसम की आवश्यकता वाली कृषि फसलों में बदलाव भूस्खलन का कारण बन रहे हैं। पहाड़ी राज्य वर्तमान में राजमार्गों से लेकर जलविद्युत परियोजनाओं तक कई निर्माण परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है.जोकि खतरनाक है।
2 राज्य में घने वन क्षेत्र में कमी -3 एक पेड़ को बड़ा होने में सैकड़ों साल लग जाते हैं, 4 पुराने पेड़ों को काटने और पौधे लगाने से जल्दी कोई मदद नहीं मिलती।5, राज्य में 10 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र नहीं बचा है.6 – पेड़ों की कटाई से मिट्टी की पकड़ प्रभावित होती है और यह भूस्खलन की वजह बनती है।
कंक्रीट से तैयार हमारी व्यवस्था वन की हरियाली को कितना बचाएगी अंदाजा साफ़ है। सिक्किम के बाद जैविक राज्य बनाने वन महोत्तसव के महत्व को जोर देने पर कार्य शथिलता भी कारण है।
इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमे अभी भी सावधानियों के चलते संकटों को कैसे टालना है। अँंथ्या अभी पिघलते हिमालय का कोर्ध हमे समुंद्री किनारों में बसे महानगरों का रौद्र विनाश देखने से कोई नहीं बचा सकेगा।
लेखक – समाज विज्ञानी पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न नंदाजी के परम शिष्य, गुलज़ारी लाल नन्दा फाउंडेशन के चेयरमेन हैं।

 

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