गाय गोबर से तैयार नाडेप कम्पोस्ट खाद के चमत्कारिक जैविक लाभ-ऐसे बनाएं घर बैठे –
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Mrs.RajshreeThakur
samajjagran24tv.com
नाडेप कम्पोस्ट (NADEP Compost) जैविक खेती के लिए एक “चमत्कारिक” समाधान माना जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें 1 किलो गोबर से लगभग 40 किलो उच्च गुणवत्ता वाली खाद तैयार की जा सकती है।
नाडेप कम्पोस्ट के मुख्य जैविक लाभ
पोषक तत्वों की प्रचुरता: इसमें नाइट्रोजन (0.5% से 1.75%), फास्फोरस (0.70% से 0.9%) और पोटाश (1.2% से 1.4%) जैसे मुख्य तत्वों के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में होते हैं।
मिट्टी की संरचना में सुधार: यह मिट्टी की जल धारण क्षमता (Water Retention Capacity) को बढ़ाता है और मिट्टी को भुरभुरा बनाता है, जिससे जड़ों का विकास बेहतर होता है।
सूक्ष्मजीवों की सक्रियता: यह खाद मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणुओं और सूक्ष्मजीवों की संख्या और गतिविधि को बढ़ाती है, जो पौधों के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता: इसके नियमित उपयोग से पौधों में रोगों और कीटों से लड़ने की प्राकृतिक शक्ति बढ़ती है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है।
लंबे समय तक प्रभाव: रासायनिक खादों के विपरीत, नाडेप खाद के पोषक तत्व धीरे-धीरे मिट्टी में रिलीज होते हैं, जिसका प्रभाव एक से अधिक मौसम तक बना रहता है।
नाडेप विधि की विशेषताएं
यह विधि महाराष्ट्र के किसान नारायण देवराव पंढरीपांडे (नाडेप काका) द्वारा विकसित की गई थी
। जिसका प्रचार नाडेप काका के पुत्र अविनाश नाडेप यवतमाल ने गुलज़ारीलाल नंदा फॉउंडेशन मंच पर महामहिम हरियाणा 2007 में राष्ट्रीय पुरस्कार फाउंडेशन चेयरमेन कृष्णराज अरुण की प्रस्तावना के बाद राष्ट्र चेतना अभियान में की गयी जिसकी नई रचना उपयोगिता कुछ खास बातें नीचे दी गई ह–
विशेषता विवरण–
गोबर की कम आवश्यकता सामान्य खाद की तुलना में बहुत कम गोबर (केवल 90-110 किलो) की जरूरत होती है।
कचरे का पुनर्चक्रण खेत का बेकार कचरा, सूखी पत्तियां और खरपतवार बहुमूल्य खाद में बदल जाते हैं।
तैयार होने का समय लगभग 3 से 4 महीनों में यह पूरी तरह सड़कर गहरे भूरे रंग की गंधहीन खाद बन जाती है।
लागत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री (ईंट, मिट्टी, गोबर) के कारण यह बेहद सस्ती पड़ती है।
पोषक तत्वों का तुलनात्मक विवरण
नाडेप खाद साधारण गोबर खाद (FYM) की तुलना में अधिक प्रभावशाली होती है:
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यह खाद न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को स्थायी रूप से बहाल करने में भी मदद करती है।
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