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हिमालय में डेंजर स्थिति में ग्लेशियर संख्या और उन्हें रोकने के सही उपाय पर गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन की समीक्षा-

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-के आर अरुण-
samajjagran24tv.com
चंडीगढ़/हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और संवेदनशील होना एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुका है। गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन (जो कि पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा जी के सिद्धांतों और समाज कल्याण के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है) ने देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों (जैसे ISRO, NRSC और भू-वैज्ञानिक संगठनों) के हालिया डेटा के आधार पर हिमालय के ग्लेशियरों की डेंजर स्थिति और उनके समाधानों की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की है।

समीक्षा के मुख्य बिंदु और ग्लेशियरों को सुरक्षित रखने के सही उपाय निम्नलिखित हैं:
🚨 हिमालय में डेंजर स्थिति में ग्लेशियर और झीलों की संख्या-
190 अति-संवेदनशील झीलें: ISRO और नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) की रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी राज्यों में 190 ग्लेशियर झीलें ‘डेंजर ज़ोन’ (अत्यधिक संवेदनशील) में हैं जो कभी भी फटने की कगार पर हैं।
858 हैंगिंग ग्लेशियर (Hanging Glaciers): पूरी 2,500 किमी लंबी हिमालयी श्रृंखला में 858 हैंगिंग ग्लेशियर चिह्नित किए गए हैं, जो पहाड़ों की ढलानों पर लटके हैं और कभी भी बड़े हिमस्खलन (Avalanche) का कारण बन सकते हैं।
अलकनंदा बेसिन का खतरा: अकेले उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर पाए गए हैं, जो बद्रीनाथ और माणा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए बड़ा खतरा हैं।
निगरानी के

दायरे में मुख्य ग्लेशियर: भारतीय हिमालयन रेंज में कुल 9,575 ग्लेशियर हैं, जिनमें से 267 बड़े ग्लेशियरों पर सरकार और वैज्ञानिक चौबीसों घंटे विशेष नजर रख रहे हैं।
🛠 ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने और आपदा टालने के सही उपाय-
गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन फाउंडेशन चेयरमेन के आर अरुण ने आंकलन की समीक्षा सर्वजनिक करते हुए सरकार तत्काल कदम उठाने की अपील है .अपनी समीक्षा में इस बात पर जोर दिया है कि प्रकृति को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन मानवीय हस्तक्षेपों को सुधारकर और सही वैज्ञानिक तकनीकों से इस खतरे को बेहद कम किया जा सकता है:-
1. पर्यावरण के अनुकूल और नियंत्रित बुनियादी ढांचा –
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की समीक्षा: संवेदनशील और डेंजर ज़ोन वाले उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों (Dams) और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए या उनकी कड़ी पर्यावरण समीक्षा होनी चाहिए।
इको-टूरिज्म और क्षमता का निर्धारण (Carrying Capacity): केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इंसानों की बढ़ती आबादी और पर्यटकों की संख्या को सीमित किया जाए ताकि वहां का तापमान न बढ़े।
2. अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning Systems) और तकनीक-
सैटेलाइट आधारित ऑटोमैटिक सेंसर: सभी 190 डेंजर ज़ोन वाली झीलों के पास ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और वॉटर लेवल सेंसर लगाए जाएं। झील का जलस्तर अचानक बढ़ने पर निचले इलाकों में तुरंत अलार्म (Warning) बज जाना चाहिए।
ग्लेशियर लेक ड्रेनेज (Controlled Discharge): जिन झीलों में पानी का दबाव खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहां से पाइपलाइन या नियंत्रित चैनल बनाकर पानी को धीरे-धीरे बाहर निकाला जाए ताकि अचानक झील फटने (GLOF) का खतरा न रहे।
ग्लेशियर लेक ड्रेनेज (Controlled Discharge): जिन झीलों में पानी का दबाव –खतरनाक स्तर पर पहुंचरहा है, वहां से पाइपलाइन या नियंत्रित चैनल बनाकर पानी को धीरे-धीरे बाहर निकाला जाए ताकि अचानक झील फटने (GLOF) का खतरा न रहे .
3. स्थानीय स्तर पर अनुकूलन (Local Adaptation & Global Action)
आर्टिफिशियल-

 ग्लेशियर (कृत्रिम ग्लेशियर): लद्दाख और ठंडे रेगिस्तानी इलाकों की तर्ज पर स्थानीय स्तर पर सर्दियों के पानी को जमाकर कृत्रिम ग्लेशियर बनाए जाएं, जिससे पानी की कमी भी दूर हो और स्थानीय तापमान नियंत्रित रहे।
अंधाधुंध शहरीकरण पर रोक: अलकनंदा और अन्य बेसिनों में पिछले कुछ दशकों में इंसानी बस्तियों में भारी वृद्धि (लगभग 616% तक) हुई है। नदी के रास्तों और ढलानों पर कंक्रीट के अवैध निर्माणों को तुरंत रो जाए।
==🎯 निष्कर्ष -गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन की फाउंडेशन की समीक्षा का मुख्य संदेश यह है कि हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए ‘विकास बनाम प्रकृति’ के संतुलन को बदलना होगा। यदि समय रहते इन 190 खतरनाक झीलों और हैंगिंग ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक प्रबंधन लागू नहीं किया गया, तो भविष्य में 2013 की केदारनाथ जैसी त्रासदियों का जोखिम लगातार बढ़ता रहेगा।

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